लोक संस्कृति का अनूठा महाकुंभ: बेणेश्वर मेला


| February 22, 2016 |

ृहमारा देश रंग.बिरंगी संस्कृतियों और अनूठी परम्पराओं का केन्द्र रहा है। युगों.युगों से हमारी सांस्कृतिक धाराएं जन.जन के तन.मन को आह्लादित करती हुई मानव सभ्यता के क्रमिक विकास की भगीरथी बहाती रही हैं। इसी परम्परा में आदिवासी संस्कृति का स्थान न केवल महत्वपूर्ण वरन् विलक्षण है। आदिवासियों की फक्कड़ जीवनशैलीए उदार संस्कृति व लोकानुरंजक परिपाटियां हैंए जिनका दिग्दर्शन भी आनन्द का सागर उमड़ा देने वाला है।

आदिवासी संस्कृति का प्रतिदर्श है मेला
राजस्थानए मध्यप्रदेश और गुजरात के सरहदी इलाके ष्वाग्वर प्रदेशष् की लोक संस्कृति भी पूरी तरह वनवासी रंगों में रंगी हुई है। यहां पुरातन काल से पौराणिक एवं आध्यात्मिक धारा के साथ वनवासी संस्कृति की महक ने सारे क्षेत्र को अद्भुत विलक्षणताओं से परिपूर्ण बना दिया है। आदिवासी संस्कृति और मेलों का बहुत पुराना संबंध रहा है। यहां हर माह कहीं न कहीं मेला.रंगों की मनोहारी छटा बिखरती रही है।

देश भर में अन्यतम है यह मेला
इन सब में माघ पूर्णिमा को लगने वाला बेणेश्वर महामेला सर्वाेपरि महत्व रखता है। हिन्दुस्तान भर के आदिवासियों का यह सबसे विराट समागम एवं श्रद्धा स्थल है। इस कारण इसे ष्वनवासियों का महाकुम्भष् भी कहा जाता है। हालांकि मेला दस दिन का होता है लेकिन मुख्य मेला पूर्णिमा को भरता है। इस बार 22 फरवरीए सोमवार को भरेगा। इसमें दो से पाँच लाख तक मेलार्थी हिस्सा लेते हैं। अबकि बार पूर्णिमा और सोमवार का योग भी खास बन पड़ा है।

बेणेश्वर मेले में जनजातीय जीवन दर्शन का हर पहलू सहज ही श्रेष्ठताओं एवं मौलिकता के साथ प्रतिबिम्बित होता है। इस मेले को यदि वनवासी संस्कृति का सटीक प्रतिदर्श कहें तो ज्यादा उपयुक्त होगा। यहां पग.पग पर आदिवासी संस्कृति और पुरातन लोक जीवन के प्राण रूपायित होते हैं।

देता है लोक मंगल का संदेश
उदयपुर संभाग में बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिलों का सरहदी पुण्य धाम बेणेश्वर दोनों के मिलन का युगों.युगों से साक्षी रहा है और मिलन सेतु के रूप में ष्वसुधैव कुटुम्बकम्ष् की भावना संचरित करता रहा है। माहीए सोम और जाखम जैसी महानदियों का पवित्र जल भी इस पुण्य धरा पर आकर अनेकता में एकता के स्वर गूंजाता है। पवित्र सलिला.त्रय का सुहाना संगम इस पुण्य तीर्थ की अपनी विशेषता है। वनवासियों के लिए यह प्रयागए गयाए काशीए पुष्कर आदि पुण्य धामों से भी बढ़ कर महत्व रखता है।

पौराणिक महत्व से भरा है बेणेश्वर धाम
रासलीला में नारद ने इस धाम के पौराणिक महत्व व आस्थाओं का बखूबी चित्रण किया है.
ष्धन्य.धन्य वेण वनरावनए धन्य मही नी रेतए
माव्य मनोहर प्रगटियाए पूरब जनम नी हेतए
धन्य.धन्य वेण वनरावनए धन्य मही को धामए
पूरब प्रीत्य जगायकेए रमस्ये केवल धामण्ण्ण्।ष्

तीन लोक से न्यारा है टापू वाला धाम
सुविस्तृत बेणेश्वर टापूए आस.पास की सरिताओंं की पवित्र जलराशि का अहर्निश निनादित कल्लोल और नैसर्गिक रमणीयता इस टापू को स्वर्ग सुख का केन्द्र बना देती है। ष्तीन लोक से मथुरा न्यारीष् की तर्ज पर यहां का आनन्द केवल वही जान सकता हैए जिसने बेणेश्वर महातीर्थ को अपनी दृष्टि से देखा हो।

लाखों भक्तों के हृदय में बसे हैं मावजी महाराज
संत मावजी और बेणेश्वर धाम एक.दूसरे के पूरक हैं। उन्हें भक्तजन भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं। बेणेश्वर मेले में त्रिकालज्ञ संत मावजी के प्रति लाखों लोगों की अपार श्रद्धा आज भी देखते ही बनती है।
मावजी की लीलास्थली बेणेश्वर का जर्रा.जर्रा तपःकणों से आप्लावित है। हर वर्ष लगने वाले मेले में मेवाड़ और वाग्वर अंचल के कई लाख श्रद्धालुओं के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों सेए खासकर मध्यप्रदेशए गुजरातए महाराष्ट्र आदि से मेलार्थी.परिवार भाग लेते हैं। ढाई शताब्दी से भी ज्यादा समय से चल रहे इस मेले जैसा कोई मेला दुनिया में नहीं दिखता।

प्रकृति लुटाती है आनंद और उल्लास
बेणेश्वर धाम पर प्रकृति का नयनाभिराम नज़ारा है। पानीए पहाड़ और हरियाली के साथ ही देवी.देवताओं और ऋषि परंपरा की मूर्तियां व मन्दिर आस्था के धाम हैं। बेणेश्वर टापू की सबसे ऊँची पहाड़ी पर स्थित बेणेश्वर शिवालयए पास ही राधा.कृष्ण का मुख्य हरि मंदिर हैए ब्रह्मा मंदिरए पंचमुखी गायत्री मंदिरए वाल्मीकि मंदिरए शबरीमाता की मूर्तिए बलि की यज्ञस्थली आदि हैं। मेले के दिनों में यहां भक्ति भावना देखने लायक होती है।

दिवंगत आत्माएं यहां पाती हैं मुक्ति
बेणेश्वर धाम पर संगम क्षेत्र विशेष महत्व है। देश भर में आदिवासियों का यही एकमात्र तीर्थ हैए जहाँ लाखों की संख्या में एक साथ स्नान.ध्यान कर धर्म लाभ लेते हैं और पितरों का ऋण उतारते हैं। संगम का आबूदरा नामक जल तीर्थ बहुत गहरा है। संगम जल में मृतात्माओं के अस्थि विसर्जनए पवित्र स्नानए तर्पणए मुंडनए सामूहिक भोजन आदि का नज़ारा अन्यतम होता है। जन मान्यता है कि बेणेश्वर के पवित्र संगम तीर्थ में अस्थि विसर्जन एवं विधि.विधान के साथ तर्पणादि से दिवंगत आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है। यही कारण है कि हजारों लोग साल भर से सहेज कर रखी गई अपने परिजनों की अस्थियां लेकर यहां आते हैं व परिवार के साथ उत्तर क्रिया करते हैं।

पवित्र स्नान देता है आरोग्य और दिव्यता
कई लाख लोग अपने.अपने परिवार के साथ अगाध श्रद्धा भाव में भर कर पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने को धन्य मानते हैं। जो लोग स्नान करने में अशक्त होते हैं वे पवित्र आचमन अथवा हाथ.पांव धोकर ही संतोष कर लिया करते हैं।

पालकी यात्रा जगाती है आकर्षण
माघ पूर्णिमा के दिन साबला गांव से विशेष रूप से बनी रजत पालकियों में बेणेश्वर धाम के महंत भगवान निष्कलंक मूर्ति भक्तजनों व मेलार्थियों के लवाजमें और जय.जायकार के साथ बेणेश्वर धाम पहुंचते हैं।

अनुपम होता है अमृत स्नान का नज़ारा
माघ पूर्णिमा को महंत कुछ देर राधा.कृष्ण मंदिर में विश्राम कर पुनः पालकी में बिराजमान होते हैं और गाजे.बाजे तथा लाखों श्रद्धालुओं की जयकार के बीच आबूदरा पहुंच कर पवित्र स्नान करते हैं व पूर्ववर्ती महंतों को जलान्जलि देने के बाद भक्तजनों द्वारा बनाये गये वस्त्र धारण करते हैं।
स्नान के बाद महंत की पालकी पुनः राधा.कृष्ण मंदिर पहुंचती है जहां मेले के चलने तक महंत वहीं परिसर में परम्परागत गादी पर बैठते हैं। मेलार्थी महंत के दर्शन व चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ग्रहण करते हैं व चढ़ावा चढ़ाते हैं। इस दौरान महंत द्वारा अपने नवीन शिष्यों को कण्ठी पहनाकर दीक्षा भी प्रदान की जाती है।

भक्ति का ज्वार उमड़ाता है वाल्मीकि मन्दिर
मेले में एटीवाला पाड़ला गांव से भी भक्तजनों द्वारा परंपरागत पालकी लायी जाती हैए जो वाल्मीकि मंदिर आकर ठहरती है। वाल्मीकि मन्दिर परिसर में धूंणी पर सामूहिक यज्ञ के साथ ही भजन.कीर्तन की धूम मची रहती है।

मेला बाजारों में रेलमपेल
मेले में हर ओर लगे मेला बाजारों में दैनिक जीवनचर्या की हर वस्तु सहज ही खरीदी जा सकती है। आदिवासी इस मेले में आवश्यक वस्तुओं की वार्षिक खरीद.फरोख़्त करते हैं। मेलार्थियों के मनोरंजन के लिए सभी प्रकार के लोकानुरंजन संसाधनों के साथ ही रंगारंग कार्यक्रम भी होते हैं।

मुग्ध हो जाते हैं देशी.विदेशी पर्यटक भी
विदेशी पर्यटक भी मेले की अभिराम छवि को देखकर अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। बड़ी संख्या में भगतोंए संत महात्माओं आदि का जमावड़ा इस धर्म धाम को भक्ति लहरियों से गुंजायमान किए रखता है।

मेले का संगीतमय सुमधुर माहौल हर किसी को आह्लाद की महागंगा में गोते लगाने को विवश कर देता है। जहां.जहां भी नज़र जाती है वहां.वहां वनवासी संस्कृति का संगीत सुनाई देता है। बेणेश्वर मेला सदियों से वनवासी संस्कृति के बहुआयामी इंद्रधनुषी रंगों को स्थापित करता आ रहा है।

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