एमबी अस्पताल में हर माह आते हैं 40 फीसदी डिप्रेशन के मरीज


| April 7, 2017 |

विश्व स्वास्थ दिवस पर डब्ल्यूएचओ की थीम “डिप्रेशन“ पर विशेष लेख

उदयपुर.
संभाग के सबसे बड़े एमबी अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में हर माह कुल आउटडोर में से 40 फीसदी मरीज डिप्रेशन की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। यह स्थिति भी तब है जब ज्यादातर मरीजों को तो पता ही नहीं है कि वे डिप्रेशन से ग्रस्त है। एमबी अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डाॅ. सुशील कुमार खेराड़ा ने बताया कि दस सालों में अवसाद से ग्रस्त मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही पढ़े लिखे लोग इसे समझ पर अस्पताल और डाॅक्टरों की शरण भी लेने लगे हैं। लेकिन आज भी विश्व में अवसाद से ग्रस्त 50 फीसदी लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है। जिससे अवसाद गंभीर रोगों का शिकार ले रहा है और ऐसे में 70 फीसदी से ज्यादा मामलों में लोग आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ की ताजा आंकड़ों से मुताबिक विश्व में 30 करोड़ लोग गंभीर अवसाद के शिकार हैं।
कमजोरी नहीं है अवसादः एमबी अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डाॅ. सुशील कुमार खेराड़ा ने बताया कि लोगों को लगता है कि अवसाद में आना कए कमजोरी और बीमारी है। इस कारण वे हिचहिचाते हैं और छुपाते हैं। लेकिन अवसाद बीमारी नहीं है। जीवन के किसी भी मोड़ पर कोई भी इंसान डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।
समय पर पहचान जरूरीः डाॅ. खेराड़ा ने बताया कि अवसाद को समय रहते पहचान लेने से उससे होने वाले गंभीर और घातक नुकसानों से बचा जा सकता है। उन्होंने बताया कि आर्थिक परेशानी, पारीवारिक झगड़े, करीबी की मृत्यु बर्दाश न कर पाना, करीयर में विफलता, परीक्षा में फेल होना आदि कई ऐसे कारण हैं जिनसे अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है। इसके अलावा कई प्रकार की बीमारी और दवाइयां भी अवसाद पैदा कर देती हैं। अवसाद होने पर लगातार मुड और मिजाज बदलना, चिड़चिड़ापन, घबराहट, अकेलापन, अरूचि जैसे लक्षध आम है। इसके अलावा खुद से प्यार न होना, धरती पर बोझ होने जैसे ख्याल आना और खुद को बेकार समझना भी अवसाद के लक्षण हैं। यही सभी लक्षण आगे गंभीर हा जाते हैं और मन में आत्महत्या जैसे विचारों का रूप ले लेते हैं।

बाॅयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड से प्यार में मिले धोखे तो ली अस्पताल की शरणः डाॅ. खेराड़ा ने बताया कि अस्पताल में अवसाद के मरीजों में यूथ की संख्या में इजाफा हुआ है। वे खुल के अपनी समस्या साझा करने लगे हैं। अस्पताल में ऐसे युवा आने लगे हैं जिन्हें प्यार में धोखा मिला हो। इसके अलावा शेयर मार्केट में नुकसान से अवसाद में आए मरीज भी अस्पताल में बहुत आ रहे हैं। युवावस्था में ही ब्लड प्रेशर, डायबिटीज की शिकायत होने पर भी लोग अवसाद से ग्रस्त हो रहे हैं। ऐसे कई मामले भी अस्पताल में आ रहे हंै।
90 फीसदी मरीजों को दवाइयों से राहतः डाॅ. खेराड़ा ने बताया कि अवसाद के तीन स्तर हैं। पहले स्तर यानि माइल्ड स्तर। इसमें मरीजों को काउंसिल किया जाता है। इसके अलावा उन्हें इस प्रकार से गाइड किया जाता है कि वे ठीक हो जाते हैं। दूसरे स्तर यानि मोडरेट स्तर में उन्हें एंटी डिप्रेशन की दवाइयां दी जाती है। दवाइयों से 90 फीसदी मरीजों को ठीक किया जा सकता है। तीसरा स्तर सीवियर यानि गंभीर स्तर। इस स्तर में मरीजों को शाॅक ट्रीटमेंट दिया जाता है। शाॅक ट्रीटमेंट से अकसर लोग घबराते हैं लेकिन ये अवसाद को खत्म करने में बहुत मददगार साबित होता है। इसमें शाॅक देकर मस्तिष्क के केमिकल्स के स्तर को बढ़ाया जाता है। इन्हीं केमिकल के स्तर के कम हो जाने के कारण अवसाद की शिकायत होती है।
परिवार और दोस्तों की महत्वपूर्ण भूमिकाः यदि आपके परिवार का कोई सदस्य दवसाद का शिकार है तो उसे आपके सपोर्ट की बेहद जरूरत है। परिवार जन और दोस्तों के साथ से उसे रीवकर करने में मदद मिलती है। अवसाद से ग्रस्त लोगों को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और हमेशा उन्हें बातें करते रहनी चाहिए। इसके अलावा हमेशा उन्हें ये एहसास दिलाते रहें कि वे खास हैं। उन्हें हमेशा मोटीवेट करते रहें।

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